सिरोंचा में बथुकम्मा उत्सव का रंगारंग आयोजन; हजारों महिलाओं की रही भागीदारी
नगर पंचायत उपाध्यक्ष बबलू पाशा की पहल; पूर्व राज्यमंत्री राजे अम्ब्रिशराव आत्राम ने भी थिरककर बढ़ाया उत्साह
संपादक : सुरेश तिपट्टीवार | सिरोंचा
सिरोंचा : तेलुगू संस्कृति की झलक, रंग-बिरंगे फूलों की सजावट और पारंपरिक गीतों की गूंज के बीच सिरोंचा शहर के विठ्ठलेश्वर मंदिर परिसर में बथुकम्मा उत्सव उत्साह के साथ मनाया गया। नगर पंचायत उपाध्यक्ष बबलू पाशा की पहल पर आयोजित इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र के साथ-साथ सीमावर्ती तेलंगाना राज्य से भी बड़ी संख्या में महिला-पुरुष शामिल हुए। फूलों से सजी बथुकम्मा और महिलाओं की सामूहिक पूजा ने पूरे परिसर को उत्सव के रंग में रंग दिया।
तेलंगाना की प्रसिद्ध गायिका मधुप्रिया की मौजूदगी ने कार्यक्रम में संगीत का रंग भर दिया। पारंपरिक तेलुगू गीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच महिलाओं ने बथुकम्मा की पूजा-अर्चना कर अपनी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
बबलू पाशा की पहल चर्चा में; हर साल आयोजन का संकल्प
इस कार्यक्रम के आयोजन में नगर पंचायत उपाध्यक्ष बबलू पाशा की भूमिका प्रमुख रही। सिरोंचा क्षेत्र में तेलुगू संस्कृति और पारंपरिक उत्सवों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने इस आयोजन की पहल की। साथ ही, हर साल अपने स्तर पर बथुकम्मा उत्सव का आयोजन जारी रखने का संकल्प भी व्यक्त किया।
स्थानीय स्तर पर बबलू पाशा की इस कार्यशैली को उनके समर्थक ‘वन मैन आर्मी’ के अंदाज से जोड़कर देखते हैं। उनके संदर्भ में “सौ सुनार की, एक लोहार की” वाला डायलॉग भी चर्चा में रहा। हालांकि, कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण महिलाओं की भागीदारी, सांस्कृतिक परंपरा और सामूहिक उत्साह रहा।
राजे अम्ब्रिशराव आत्राम ने भी मिलाई ताल से ताल
कार्यक्रम में भाजपा नेता तथा महाराष्ट्र के पूर्व राज्यमंत्री राजे अम्ब्रिशराव महाराज आत्राम भी उपस्थित रहे। उत्सव के दौरान उन्होंने पारंपरिक नृत्य में हिस्सा लिया और गीतों की धुन पर ताल से ताल मिलाई। उनके नृत्य में शामिल होने से कार्यक्रम का माहौल और उत्साहपूर्ण हो गया।
इस अवसर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के पदाधिकारी, स्थानीय गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
तेलुगू संस्कृति और महिला एकजुटता का संदेश
बथुकम्मा तेलंगाना की प्रमुख पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान में से एक है। इसमें विभिन्न प्रकार के फूलों से आकर्षक सजावट की जाती है और महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना तथा पारंपरिक गीतों के जरिए उत्सव मनाती हैं।
तेलंगाना की सीमा से सटे सिरोंचा में इस उत्सव का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। महाराष्ट्र और तेलंगाना के लोगों की भागीदारी ने सीमावर्ती क्षेत्र की सांस्कृतिक साझेदारी को भी सामने रखा।
बथुकम्मा उत्सव के जरिए जहां पारंपरिक विरासत को संजोने का प्रयास दिखाई दिया, वहीं बबलू पाशा ने इसे हर साल आयोजित करने का संकल्प व्यक्त किया। अब आने वाले वर्षों में इस आयोजन को किस तरह निरंतरता मिलती है, इस पर स्थानीय लोगों की नजर रहेगी।
त्रिवेणी न्यूज़ एक्सप्रेस
